Wednesday, November 19, 2008

चुप के रहना ठाना है

तो इब्तदा मीर की इस गज़ल से जो आज के माहौल में किसी भी सच्चे इंसान का दर्द बयां करती है-

दिल की बात कही नहीं जाती, चुप के रहना ठाना है
हाल अगर है ऐसा ही तो जी से जाना जाना है
सुर्ख़ कभू है आँसू होके ज़र्द् कभू है मूँह मेरा
क्या क्या रंग मोहब्बत के हैं, ये भी एक ज़माना है
फ़ुर्सत है यां कम रहने की, बात नहीं कुछ कहने की
आँखें खोल के कान जो खोले बज़्म-ए-जहां अफ़साना है
तेग़ तले ही उस के क्यूँ ना गर्दन डाल के जा बैठें
सर तो आख़िरकार हमें भी हाथ की ओर झुकाना है

Thursday, November 13, 2008

अपने बारे में...

नाम है अमन मौला, मस्तमौला हूँ, कुछ लिखना शुरू करना है...