तो इब्तदा मीर की इस गज़ल से जो आज के माहौल में किसी भी सच्चे इंसान का दर्द बयां करती है-
दिल की बात कही नहीं जाती, चुप के रहना ठाना है
हाल अगर है ऐसा ही तो जी से जाना जाना है
सुर्ख़ कभू है आँसू होके ज़र्द् कभू है मूँह मेरा
क्या क्या रंग मोहब्बत के हैं, ये भी एक ज़माना है
फ़ुर्सत है यां कम रहने की, बात नहीं कुछ कहने की
आँखें खोल के कान जो खोले बज़्म-ए-जहां अफ़साना है
तेग़ तले ही उस के क्यूँ ना गर्दन डाल के जा बैठें
सर तो आख़िरकार हमें भी हाथ की ओर झुकाना है
Wednesday, November 19, 2008
Thursday, November 13, 2008
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